आस्था, विश्वास और उम्मीद की दिल छू लेने वाली कहानी
मैं बताता हूं दोस्तों कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें आप देखते हैं, थोड़ा मनोरंजन होता है और थिएटर से बाहर निकलते ही बात वहीं साधारण हो जाती है और सब भूल जाते हैं।
लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो खत्म होने के बाद भी मन में कहीं न कहीं बनी रहती हैं और भुलाया नहीं जाता हैं।

हनुमान अंश मुझे भी कुछ ऐसी ही फिल्म लगी।
यह फिल्म नीम करोली बाबा, जिन्हें महाराज जी के नाम से भी जाना जाता है, उनके जीवन और आध्यात्मिक सफर पर आधारित है। लेकिन फिल्म को सिर्फ एक धार्मिक या आध्यात्मिक कहानी कहना थोड़ा कम होगा।
इसके अंदर एक इंसान की भावनाएं हैं—अपनों को खोने का दर्द, जवाब तलाशने की बेचैनी, भगवान पर विश्वास, प्यार, सेवा और मुश्किल समय में हिम्मत बनाए रखने की कोशिश।
और सच कहूं तो फिल्म की सबसे अच्छी बात यही है कि यह सिर्फ बाबा की कहानी बताने की कोशिश नहीं करती, बल्कि हमें उनकी उस यात्रा का हिस्सा बनाने की कोशिश करती है।
कहानी की शुरुआत एक बहुत ही भावुक सवाल से होती है
फिल्म की शुरुआत एक ऐसी परिस्थिति से होती है जो सीधे दिल को छूती है।
एक छोटा बच्चा अपनी मां को खो देता है। जिसे देखकर मेरे आँखों में आँसू आ गया था। मां को खोने का दर्द उसके अंदर इतना गहरा है कि वह उसे दोबारा पाना चाहता है। उसके मन में बस एक ही सवाल है—क्या वह अपनी मां से फिर मिल सकता है?
यहीं से उसकी तलाश शुरू होती है।
पहले वह अपनी मां को खोज रहा होता है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी यह तलाश भगवान और जिंदगी के बड़े सवालों तक पहुंच जाती है।
और यहीं से कहानी एक अलग रास्ता पकड़ती है। जो बहुत दिलचस्प कहानी शुरू कर देता हैं।
मैं कहानी के आगे के बड़े हिस्से के बारे में ज्यादा नहीं बताऊंगा, क्योंकि इस फिल्म को देखने का मजा इसी सफर में है कि एक बच्चे की यह छोटी-सी तलाश आखिर उसे कहां तक लेकर जाती है।
आगे चलकर यही यात्रा नीम करोली बाबा के रूप में सामने आती है।
मुझे कहानी की शुरुआत इसलिए अच्छी लगी क्योंकि फिल्म सीधे यह नहीं कहती कि “ये एक महान संत की कहानी है।” पहले वह हमें उस इंसान की भावनाएं समझाती है, जो अपने सबसे प्यारे इंसान को खो चुका है और उसके बाद जवाब तलाश रहा है।
और यह दर्द किसी भी इंसान को समझ आ सकता है।
कलाकारों ने अपने अभिनय दिखाने के लिये अपना जान लगाकर मेहनत किया हैं
ऐसी फिल्म में अभिनय आसान नहीं होता। खासकर तब, जब कहानी एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के जीवन पर आधारित होती हैं।
विहान शेडगे ने युवा बाबा का किरदार निभाया है। उनके किरदार में मासूमियत और अंदर चल रही भावनाओं को दिखाना जरूरी था, क्योंकि अगर शुरुआत में बच्चे का दर्द दर्शक महसूस नहीं करेगा तो आगे की यात्रा से जुड़ना मुश्किल हो सकता है।
इसके बाद शोभिनॉ सत्या नीम करोली बाबा के किरदार में नजर आते हैं, जबकि हनी बक्शी बड़े बाबा का किरदार निभाते हैं।
यहां सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बाबा जैसे किरदार को सिर्फ बड़े-बड़े डायलॉग बोलकर निभाया नहीं जा सकता। उसमें एक ठहराव, शांति और अलग तरह की मौजूदगी चाहिए होती हैं।
शोभिनॉ सत्या के किरदार में यही चीज देखने को मिलती है। उनका काम सिर्फ डायलॉग बोलना नहीं है, बल्कि किरदार के आध्यात्मिक व्यक्तित्व को महसूस करवाना भी है। जिससे फिर देखने वाला भूल जाए कि ये ही हैं असली बाबा।
चंदन आनंद ने डॉ. राम नंदन भोसले का किरदार निभाया है। उनका किरदार कहानी में एक अलग नजरिया लेकर आता है और बाबा की आध्यात्मिक दुनिया को आम इंसान के अनुभवों से जोड़ने में मदद करता है।
इसके अलावा अनिल रस्तोगी महंत जी, भगवान दास पटेल गोपाल दास बहेड़िया और नेहा परांजपे पार्वती देवी के किरदार में नजर आते हैं।
इस फिल्म के सभी किरदारों का अपना एक अलग ही महत्व है और ये फिल्म की दुनिया को थोड़ा अलग और बड़ा बनाते हैं।
फिल्म की कहानी ज्यादा भावनाओं पर चलती है
हनुमान अंश की कहानी का सबसे अच्छा हिस्सा यह है कि यह हर डायलॉग को जबरदस्ती बहुत बड़ा और दार्शनिक बनाने की कोशिश नहीं करती। कुछ बाते बिना बोलें ही समझ आ जाता हैं जो दिल को सुकून भी देता हैं।
कई जगह भावनाएं खुद बोलती हैं।
फिल्म की मूल बात बहुत आसान है—जब इंसान मुश्किल समय में फंस जाता है और उसे समझ नहीं आता कि आगे क्या करना है, तब आस्था उसे हिम्मत दे सकती है। जिसे इंसान को अपने जिंदगी में आगे क्या करना है इसका अहसास हो जाता हैं।
और यह बात किसी भी इंसान को समझ आ सकती है।
इसके लिए आपका बहुत ज्यादा धार्मिक होना जरूरी नहीं है।
किसी अपने को खोने का दर्द, किसी मुश्किल वक्त में भगवान को याद करना या किसी सवाल का जवाब ढूंढना—ये सब बहुत आम मानवीय भावनाएं हैं। जिसके कारण फिल्म और इंसान का एक अलग रिश्ता बना जाता हैं।
हां, कहानी के कुछ हिस्से आपको पहले से अंदाजा दे सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है, क्योंकि हमें पता है कि फिल्म किस व्यक्तित्व की जीवन यात्रा बता रही है।
इसलिए यहां असली मजा यह जानने में नहीं है कि “आगे क्या होगा”, बल्कि यह देखने में है कि वह इंसान वहां तक कैसे पहुंचता है।

क्या फिल्म कहीं धीमी लग सकती है?
फिल्म लगभग 2 घंटे 30 मिनट की ही है।
अब ढाई घंटे की फिल्म में पेसिंग बहुत मायने रखती है।
अगर आप सिर्फ तेज एक्शन, लगातार कॉमेडी या हर कुछ मिनट में कोई बड़ा ट्विस्ट चाहते हैं, तो फिल्म के कुछ हिस्से आपको थोड़े धीमे लग सकते हैं। क्यूं कि यह रील का जमाना हैं।
लेकिन इस फिल्म को उसी नजर से देखना शायद ठीक भी नहीं होगा।
क्योंकि हर चीज तेज गति से नहीं दिखाई जा सकती।
कुछ भावनाओं को समय देना पड़ता है।
कुछ दृश्यों में चुप्पी भी जरूरी होती है।
और कुछ पल ऐसे होते हैं जिन्हें थोड़ा रुककर महसूस करना पड़ता है।
फिल्म के दूसरे हिस्से में भावनात्मक वजन ज्यादा महसूस होता है और कहानी धीरे-धीरे अपने महत्वपूर्ण पलों की तरफ बढ़ती है। तो आपको ये महसूस नहीं होगा कि ये फिल्म बहुत जड़ा धीमा हैं।
निर्देशन में भावनाओं और आध्यात्मिकता का संतुलन
फिल्म को लिखने और निर्देशित करने की जिम्मेदारी विशाल चतुर्वेदी की है।
किसी आध्यात्मिक व्यक्ति की जिंदगी को फिल्म में दिखाना आसान काम नहीं होता है। अगर फिल्म सिर्फ घटनाएं बताती रहे तो वह डॉक्यूमेंट्री जैसी लग सकती है, और अगर जरूरत से ज्यादा भावुक हो जाए तो कहानी भारी लगने लगती है।
यहां कोशिश दोनों के बीच संतुलन बनाने की है।
फिल्म बाबा को सिर्फ एक महान व्यक्ति के रूप में दिखाने के बजाय उनकी यात्रा को समझाने की कोशिश करती है।
यही वजह है कि कहानी में इंसान वाला पक्ष भी बना रहता है।
और यह काम निर्देशन ने बखूबी करते हैं।
कैमरा और विजुअल्स
फिल्म का माहौल बनाने में कैमरा और विजुअल्स का भी अच्छा योगदान है। जिस तरह से इसकी सूटिंग करी गई हैं वह बहुत ही अच्छा हैं।
आध्यात्मिक कहानी में सिर्फ खूबसूरत जगहें दिखा देना काफी नहीं होता। लाइटिंग, कैमरा एंगल, लोकेशन और फ्रेमिंग सब मिलकर एक माहौल तैयार किया जाता हैं।
शांत दृश्यों में कैमरा किरदार के साथ थोड़ा समय बिताता है, जिससे भावनाओं को समझने का मौका मिलता है।
और जब कहानी आध्यात्मिक पलों की तरफ बढ़ जाती है, तब विजुअल्स भी थोड़े बड़े स्तर का एहसास देते हैं।
यानी कैमरा सिर्फ चीजें दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि माहौल बनाने में भी मदद करता है। जो आंखों को देखने में बहुत खुशी सी महसूस होती हैं।
म्यूजिक और बैकग्राउंड म्यूजिक
इस तरह की फिल्म में संगीत बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
कई बार किसी सीन में डायलॉग से ज्यादा बैकग्राउंड म्यूजिक असर करता है।
ऐसा ही इस मूवी में हैं जहाँ पर भी बाबा को दिखाया जाता हैं सब जगह बैकग्राउंड में ऐसा म्यूजिक बजाया गया हैं जो मन को मोह लेती हैं।
एक साधारण-सा भावुक सीन अगर सही समय पर संगीत के साथ आए तो उसका असर कई गुना बढ़ सकता है।
हनुमान अंश के आध्यात्मिक हिस्सों में संगीत इसी तरह माहौल बनाने का काम करता है।
जहां पर ओम और श्री राम नाम का धुन मन में समा जाती है और गूंजती रहती हैं।
भक्ति, शांति, दर्द और उम्मीद—इन सभी भावनाओं को संगीत के जरिए और मजबूत करने की कोशिश की गई है।
और जब बैकग्राउंड म्यूजिक सही जगह पर आता है तो आपको यह महसूस होता है कि आप सिर्फ सीन देख नहीं रहे, बल्कि उसे महसूस भी कर रहे हैं।
आखिर फिल्म कहना क्या चाहती है?
मेरे हिसाब से यही फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिल्म सिर्फ यह नहीं कहती कि आस्था रखो।
यह दिखाने की कोशिश करती है कि आखिर इंसान को आस्था की जरूरत क्यों पड़ती है।
जब जिंदगी हमसे किसी अपने को छीन लेती है, जब कोई रास्ता समझ नहीं आता या जब हम किसी मुश्किल परिस्थिति में फंस जाते हैं, तो हमारे मन में कई सवाल आते हैं।
ऐसा क्यों हुआ?
अब क्या होगा?
आगे कैसे बढ़ेंगे?
क्या सब ठीक हो पाएगा?
ये सब सवाल मन में आते रहते हैं।
ये सिर्फ धार्मिक सवाल नहीं हैं। ये इंसान के सवाल हैं।
और शायद इसी वजह से नीम करोली बाबा की कहानी आज भी लोगों को छूती है।
फिल्म प्यार, सेवा, भोजन, करुणा, भक्ति और इंसान के अंदर मौजूद विश्वास की बात करती है।
सबसे आसान शब्दों में कहूँ तो यह उस हिम्मत की कहानी है जो इंसान को तब मिलती है, जब उसे लगता है कि अब उसके पास कुछ बचा ही नहीं है। लगता हैं जैसे सब कुछ खों दिया हो।
फिल्म का इमोशनल असर
इस फिल्म को देखकर हर इंसान का अनुभव अलग हो सकता है।
जिसने किसी अपने को खोया है, वह फिल्म की शुरुआत से ज्यादा जुड़ सकता है।
जो किसी मुश्किल दौर से गुजर रहा है, वह आस्था वाली बातों को अलग तरीके से महसूस कर सकता है।
और जो आध्यात्मिक चीजों में विश्वास रखता है, उसके लिए बाबा की यात्रा का मतलब शायद और भी गहरा हो सकता है।
लेकिन फिल्म की सबसे खूबसूरत बात यह है कि आपको इसे समझने के लिए किसी खास तरह का इंसान होने की जरूरत नहीं है।
बस अपने दिल से देखिए।
क्योंकि हर किसी की जिंदगी में कोई न कोई ऐसा इंसान जरूर होता है जिसे वह बहुत प्यार करता है।
हर किसी ने कभी न कभी किसी मुश्किल समय में उम्मीद की होगी।
और हर किसी ने कभी न कभी भगवान से कोई सवाल जरूर किया होगा।
यहीं फिल्म आपके अपने जीवन से जुड़ने लगती है।
और आप फिल्म देखते देखते इसमें खो जाते हैं।
मेरा अंतिम राय:
तो क्या हनुमान अंश सिर्फ एक धार्मिक फिल्म है?
मेरे हिसाब से इसे सिर्फ इतना कहना सही नहीं होगा।
यह एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो अपनी मां को खोजते-खोजते भगवान की तलाश तक पहुंच जाता है और जिसकी यह तलाश आगे चलकर एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक यात्रा बन जाती है।
यह आस्था की कहानी है, लेकिन साथ ही इंसान की भी कहानी है।
यह दर्द की कहानी है, लेकिन उम्मीद की भी है।
यह भक्ति की कहानी है, लेकिन प्यार और सेवा की भी है।
अगर आपको धार्मिक फिल्में, आध्यात्मिक कहानियां, बायोपिक या दिल से जुड़ी फिल्में पसंद हैं, तो हनुमान अंश आपके लिए एक अलग तरह का अनुभव दे सकती है।
परिवार के साथ इस तरह की फिल्में पसंद करने वाले दर्शक इससे आसानी से जुड़ सकते हैं। वहीं अगर आपको सिर्फ तेज रफ्तार एक्शन, हर कुछ मिनट में कॉमेडी या लगातार ट्विस्ट वाली फिल्में पसंद हैं, तो इसके कुछ धीमे हिस्से आपको अलग महसूस हो सकते हैं।
लेकिन अगर आप थिएटर में बैठकर फिल्म को थोड़ा समय देते हैं और कहानी को अपने तरीके से आगे बढ़ने देते हैं, तो इसके कुछ पल सच में दिल को छू जाते हैं।
और शायद फिल्म की सबसे खूबसूरत बात यही है।
थिएटर से बाहर निकलते समय आपकी जिंदगी की परेशानियां शायद वहीं रहेंगी।
लेकिन हो सकता है कि उन्हें देखने का आपका नजरिया थोड़ा बदल जाए।
हो सकता है आपको किसी अपने की याद आ जाए।
हो सकता है आप कुछ देर चुप रहें।
या शायद मन में बस इतना आए कि मुश्किल वक्त हमेशा नहीं रहता।
और कई बार इंसान को आगे बढ़ने के लिए बस इतनी-सी उम्मीद ही काफी होती है।
हनुमान अंश सिर्फ एक संत की आध्यात्मिक यात्रा की कहानी नहीं है। यह आस्था, प्यार, हिम्मत और उस उम्मीद की कहानी है जो इंसान को मुश्किल समय में भी आगे बढ़ते रहने की ताकत देती है।
कुछ फिल्में आपका मनोरंजन करती हैं।
कुछ फिल्में आपको कुछ सिखाती हैं।
और कुछ फिल्में खत्म होने के बाद आपको थोड़ी देर चुपचाप जिंदगी के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
हनुमान अंश मेरे लिए ऐसी ही फिल्म है।
हनुमान अंश फिल्म का रेटिंग :⭐⭐⭐⭐⭐½
मुझे लगता है हनुमान अंश के लिए कितना भी रेटिंग मायने नहीं रखता है, लेकिन फिर भी मेरे अनुसार मैं इस फिल्म को दूंगा पांच में से 4.5 जो की सबसे अच्छी फिल्म के लिए दिया जाता है |
